बैतूल: मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल बैतूल जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर अक्सर दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जिला अस्पताल परिसर में दूर-दराज के गांवों से आने वाले मरीजों के परिजनों के ठहरने के लिए लगभग ₹60 लाख की भारी-भरकम लागत से बनाया गया ‘सराय भवन’ आज एक ‘सफेद हाथी’ साबित हो रहा है। आलम यह है कि करोड़ों की यह इमारत धूल खा रही है, जबकि बाहर कड़ाके की ठंड और बर्फीली हवाओं के बीच बेबस ग्रामीण खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हैं।
प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ी सुविधा
इस सराय भवन का निर्माण इसलिए किया गया था ताकि जिला अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीजों के परिजनों को रुकने के लिए भटकना न पड़े। विशेष रूप से सर्दी और बारिश के मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोग, जो होटलों का खर्च वहन नहीं कर सकते, उनके लिए यह भवन एक बड़ी राहत होना था।
लेकिन भवन बनकर तैयार होने के महीनों बाद भी इसे विधिवत रूप से शुरू नहीं किया गया है। स्थानीय लोगों और परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन के बीच तालमेल की कमी और ‘हैंडओवर’ की तकनीकी उलझनों के कारण इस पर ताला लटका हुआ है।
ठिठुरती रातें और अलाव की आस
बैतूल में इन दिनों न्यूनतम तापमान 12°C से 14°C के बीच बना हुआ है। रात होते ही सर्द हवाएं जिस्म को कपाने लगती हैं।
- परिजनों का दर्द: अस्पताल की गैलरी और बाहर के खुले मैदान में बिछौना लगाकर सो रहे परिजनों का कहना है कि वे रात भर ठंड के कारण सो नहीं पाते।
- अलाव का सहारा: मजबूरन लोग पुराने कागजों, लकड़ियों और कचरे को इकट्ठा कर अलाव जलाते हैं ताकि थोड़ी गर्माहट मिल सके।
- सुरक्षा का खतरा: खुले में सोने के कारण न केवल स्वास्थ्य बिगड़ने का डर रहता है, बल्कि सामान चोरी होने और आवारा कुत्तों के हमले का खतरा भी बना रहता है।
[Image showing the locked ‘Sarai Bhavan’ building at Betul District Hospital while family members huddle around a small fire outside]
सफेद हाथी: ₹60 लाख का क्या हुआ?
सवाल यह उठता है कि जनता की गाढ़ी कमाई के 60 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी यदि इसका लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल रहा, तो इस निवेश का क्या अर्थ है?
- रखरखाव का अभाव: बंद पड़े रहने के कारण भवन के भीतर गंदगी जमा हो रही है और फिटिंग्स खराब होने की आशंका है।
- कर्मचारियों की कमी: सूत्रों की मानें तो भवन को संचालित करने के लिए आवश्यक स्टाफ (सफाईकर्मी और गार्ड) की नियुक्ति न होना भी इसके बंद रहने का एक बड़ा कारण है।
- सिस्टम की विफलता: अस्पताल प्रशासन अक्सर गेंद लोक निर्माण विभाग (PWD) के पाले में डाल देता है, जबकि PWD का कहना है कि उन्होंने काम पूरा कर लिया है।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आक्रोश
बैतूल के सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे पर प्रशासन को घेरा है। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार ‘स्वच्छता’ और ‘सुविधाओं’ की बात करती है, और दूसरी तरफ एक तैयार भवन को केवल इसलिए नहीं खोला जा रहा क्योंकि किसी ‘वीआईपी’ द्वारा इसका औपचारिक उद्घाटन होना बाकी है या कागजी कार्रवाई अधूरी है।
अस्पताल प्रबंधन का पक्ष
जब इस संबंध में अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों से बात की गई, तो उन्होंने गोल-मोल जवाब देते हुए कहा कि “प्रक्रिया चल रही है और जल्द ही इसे जनता के लिए खोल दिया जाएगा।” हालांकि, ‘जल्द’ की कोई निश्चित तारीख बताने को कोई तैयार नहीं है।
निष्कर्ष
बैतूल जिला अस्पताल का यह सराय भवन सरकारी तंत्र की उस विफलता का प्रतीक है जहाँ ईंट और गारे की इमारतें तो खड़ी कर दी जाती हैं, लेकिन उनमें मानवीय संवेदनाओं की कमी होती है। जब तक यह ताला नहीं खुलता, तब तक बैतूल की सर्द रातें गरीब परिजनों के लिए किसी सजा से कम नहीं होंगी।
